• Pragya Tripathi

"कलम सचाई की" by Vikas Jati


अगर इबादत भी करूं तो खुदा दफा है

आँखों के बीच जमाकर रखी है

कुछ बेरंग सी ख्वाब मैंने,

पर्दे उठाकर देखोगे तो

घुट रही आज़माइशों की भी

अपनी एक हया है

न रज़ा है न सज़ा है

कि ज़िन्दगी मेरी झूटी बर्तन है और

मैखाने में दबी ग़मों का

दावत उड़ाते हैं सभी,

बंजर कोख की सिर्फ एक

उपज-सोच से भरी सिहाई ही बची है मेरी

जो इन खाली काली रातों में

किताबों के बीच दबा-कुचला होने पर भी

मैं ज़िंदा हूं ज़िंदा हूं कहकर फड़फड़ाता है

न रज़ा है न सज़ा है

लिखना और लिखकर भूल-जाना

कमज़ोरी नही मेरी यारो

बीते यादों कि भारी कारीगरी है

मानो एक पल के लिये नम आँखों को

पढ़ ना पाया कोइ अगर

वैश्या मन ने किताबों के बीच

उतरन उतार रखी है ।

न रज़ा है न सज़ा है


Editor says: ज़िंदगी न आपकी मर्ज़ी से ही चलती है और न ही आपकी चाहत से हमेशा उलट, न ही हर दुआ क़बूल होती है, और न ही हर सदा ठुकराई जाती है, इन दोनों आशादों के बीच उफ़नाती और इठलाती है ज़िन्दगी की कश्ती , पर ये झूलता सा समय अखरता है मन को और उसी उलझे से मन की सच्ची सी आवाज़ है "कलम सच्चाई की"



About the author: Poetry defies language and I strive to be that defiance. Almost 22, a writer who happens to be an engineer, my words try to break barriers I've been set in, be it the barriers of machines or the barriers of my broken home. Instagram - @vikas.writes

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New Delhi

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