• Priyanka Srivastava

"गीला तौलिया" - आकाश

मेरी जिंदगी एक होटल के गिले तौलिये की तरह हो गई है

जितनी देर बिस्तर पर रखोगे

उतना बास मारूंगा

धूप में ले जाओगे रोशनी में चमकाओगे

तो एकदम कड़क हो जाऊंगा

रस्सी के निशान मेरे शरीर पर रह जाएंगे

बाल झड़ने लगेंगे

धुल धुल के वो तुम्हें खुरचने लगेंगे

मरोड़ दो कॉर्पोरेट अलमारियों में जितना भी

मैं फिर भी ना पछताऊंगा

वहा भी मैं इंतजार करूंगा सफेद धब्बे लेकर


कभी तो कोई आएगा

मुझे सुबह फिर से अपने बिस्तर पर लेटाएगा

मैं उनके बदन पर ढलने लगूंगा

उनके ही जैसा महकने लगूंगा

चाहे सिर्फ चंद पल के लिए

मगर मैं फिर से पिघलने लगूंगा

थोड़ा सा चहकने लगूंगा

फिर तुम मुझे अपने तकिए पर छोड़ जाओगे

मैं फिर भी तुम्हें माफ करूंगा

तुम्हारी महक को याद करूंगा

मगर ये याद रहे

ये यादें सीलन भरी होंगी।

Editorial : आकाश ने कविता में एक गीले तोलिए के सहारे अपने जीवन के बारे में एक चित्र खिचा है हमारे लिए और जीवन के अलग अलग रंगो को शब्दों में पिरो दिया है।

हम कवि के शब्दों से उसके अंत मन में झांक सकते है, कुछ अकेलेपन की उदासी कुछ वैरागी स्वभाव और कुछ अनदेखे पलोको कविता में लिख दिया है और उसका नाम रख दिया है गीला तौलिया पर है तो वो कवि का मन। कुछ यादों को हम अपने साथ जीवित रखते है जैसा कवि ने यहा लिखा है| (Priyanka) Aakash is just another brisk walker with a college degree and sometimes he nerds about Nikola Tesla did you know he was friends with a brown pigeon?

 

New Delhi

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