"गीला तौलिया" - आकाश

मेरी जिंदगी एक होटल के गिले तौलिये की तरह हो गई है

जितनी देर बिस्तर पर रखोगे

उतना बास मारूंगा

धूप में ले जाओगे रोशनी में चमकाओगे

तो एकदम कड़क हो जाऊंगा

रस्सी के निशान मेरे शरीर पर रह जाएंगे

बाल झड़ने लगेंगे

धुल धुल के वो तुम्हें खुरचने लगेंगे

मरोड़ दो कॉर्पोरेट अलमारियों में जितना भी

मैं फिर भी ना पछताऊंगा

वहा भी मैं इंतजार करूंगा सफेद धब्बे लेकर


कभी तो कोई आएगा

मुझे सुबह फिर से अपने बिस्तर पर लेटाएगा

मैं उनके बदन पर ढलने लगूंगा

उनके ही जैसा महकने लगूंगा

चाहे सिर्फ चंद पल के लिए

मगर मैं फिर से पिघलने लगूंगा

थोड़ा सा चहकने लगूंगा

फिर तुम मुझे अपने तकिए पर छोड़ जाओगे

मैं फिर भी तुम्हें माफ करूंगा

तुम्हारी महक को याद करूंगा

मगर ये याद रहे

ये यादें सीलन भरी होंगी।

Editorial : आकाश की कविता में एक गीले तौलिये का वर्णन है, अपने शब्दों से कवि ने हमें उस कपड़े के बारे में बताया  है जिसको हम कभी ध्यान से नहीं देखते हैं, बस इस्तेमाल करके भूल जाते हैं,  कविता पढ़ते वक्त मुझे उन रिश्तों की याद आ गयी जो समय के साथ कहीं पीछे छूट  गए हैं। कविता के  पहले भाग  में हम तौलिये को शब्दों के साथ बदलते हुए देखते हैं, बेरंग और कड़क हो कर भी तौलिये  में एक इंतेज़ार है की कोई तो आएगा।कविता के दूसरे भाग में तौलिये  को उन पलों का इंतेज़ार है जब कोई उसे फिर से वैसे ही  प्यार करेगा। जैसा कि कवि ने लिखा है “कभी तो कोई आएगा, मुझे सुबह फिर से अपने बिस्तर पर लिटाएगा”। कविता ख़त्म  तो हो जाती है पर एक उदासी छोड़  जाती है  पन्नों  पर जैसे  कोई और बात उस गीले तौलिये  को  कहनी थी  जो अनसुनी सी रह गयी। (Priyanka) Aakash is just another brisk walker with a college degree and sometimes he nerds about Nikola Tesla did you know he was friends with a brown pigeon?