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"शमशान की गलियां" by Aakash Jain

कभी श्मशान की शांति को लपटों की चटक आवाज से भंग होते सुना है?

कभी लाश को बर्फ कि सिल्ली पर रखा है, एक आखरी सलामी की चाहत के लिए?

कभी मय्यत के टेंट में कुर्सियां बिछाई है?

सारे बुजुर्गों की गुटर गू और मेलजोल को सुना है ?

यूं तो वर्षों से रंजिश में थे मगर आज फिर पिछली मुलाकात को याद कर रहे हैं जैसे यह लम्हा बेमिसाल हो।

कभी जुबान लड़खड़ाई है आस-पड़ोस के लोगों को कारण बताते बताते हैं?

कभी रात को यह सोचा है कि सुबह कितना अंधेरा कर सकती है?

कभी सड़ती हुई लाश को एक आखरी बार नहलाया है?

कभी नंगे पैर तेज गर्म रोड़ी पर डगमगाते कंधे से अर्थी का बोझ उठाया है?

लोग कहते हैं मरने के बाद शरीर बहुत भारी हो जाता है,

सही कहते हैं

इतना भार कोई नहीं उठा सकता।

कभी झूठ मूठ का रोना देखा है किसी की मौत पर?

कभी झूठ मूठ रोए हो?

कभी पूछा है क्यों सारे मर्द बाहर कुर्सियों पर गप्पे लड़ा रहे हैं और सारी औरतें एक दूसरे के टसुए संभाल रही हैं?

कुछ तो अभी भी चाय बना रही हैं।

और कुछ अभी भी छाती पीट रही है, आशा लगाए की कोई तो आवाज आए।

कभी देसी घी और कपूर की महक तुम्हारे सर चढ़ी है?

कभी मोटा लक्कड़ नीचे और छोटा लक्कड़ ऊपर रखकर

मृत को सैलाया है?

कभी घंटों आग खत्म होने का इंतजार किया है इस डर से की आखरी बार तो कुछ गलती ना हो?

कभी शमशान की काली सीढ़ियां और बचा हुआ पिछला राख झाड़ू मार कर साफ किया है?

कभी सोचा है इन सबके बाद करना क्या है भूख तो बहुत तेज लगी है मगर खाना क्या है?

कभी सोचा है इस झुलसति रेत से तुम्हें बरसात की कितनी याद आएगी?

कभी ध्यान दिया है कब्रिस्तान की गलियां और उनमें रहने वाले परिवार का दिनचर्या कैसी होती होगी?

सुबह खिड़की खोलते ही पहली घूंट जबान को मिट्टी और धुएं से भर देती होगी।

हर जगह एक आखरी महक बहक रही होगी।

कभी सोचा है, किसी के लिए दुनिया का सबसे भारी दिन इन गलियों में खेलते बच्चों के लिए एक और एंटरटेनमेंट का जरिया बन जाएगा, अगर गेंद अंदर गई तो उसको कौन लेकर आएगा?

मैंने तो सोचा है!

(c) Aakash Jain


Editorial comment: शमशान कविता में आकाश ने आसान शब्दों का प्रयोग करके उस दुनिया का चित्र पन्ने पर खिचा है जिससे हम दूर रहते है। कैसे वो क़पूर और घी की ख़ुशबू हमारे अंदर बस जाती है और वो बेपरवाह से ख़्याल खटखटाने लगते है, और हम उन पुरानी यादों को झकझोर कर थोड़ा मुस्कुरा भी लेते है ।

कविता में दो तरह के लोगों का वर्णन है ।वोह लोग जो दुःख को भुलाने की कोशिश करते है और दूसरे वोह लोग जिनकी रोज़ की ज़िंदगी वही पे गुजरती है । यह कविता पढ़ने के बाद आपके अंदर बस जाती है। मौत कहा रुकती है, मौत तो रुला कर उन यादों को छोड़ कर चलीं जाती है जिनको हम तारो के साथ सजाते रहते है ज़िंदगी भर। जैसा कि कवि ने लिखा है कभी रात को यह सोचा है की सुबह कितना अंधेरा कर सकती है।

-Priyanka

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